पुनर्जन्म का सिद्धांत

Motivation| प्रेरणा: भारतीय संस्कृति में पुनर्जन्म की स्पष्ट अवधारणा है। भारतीय संस्कृति के प्रमुख धर्मग्रंथों में से एक श्रीमद्भगवद्गीता में पुनर्जन्म की मान्यता व अवधारणा को स्पष्ट करते हुए भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं – न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः । न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ।। – गीता 2.12 अर्थात हे अर्जुन ! न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे। भगवान श्रीकृष्ण (गीता 2.13) में कहते हैं- देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ।। -गीता 2.13 अर्थात जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है। भगवान श्रीकृष्ण पुनः (गीता 2.22) में कहते हैं- वासांसि जीर्णानि यथा विहाय।
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही ।। अर्थात जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होती है। पुनर्जन्म होता क्यों और कैसे है? क्या जीवन-मरण का कोई अंत नहीं? ऐसे सहज प्रश्न हमारे मन में उठ खड़े होते हैं। पुनर्जन्म का अर्थ है पुनः-पुनः जन्म ग्रहण करना। दरअसल पुनर्जन्म की अवधारणा कर्मफल-सिद्धांत तथा आत्मा की अमरता से ही प्रस्फुटित हुई है। जीवात्मा को अपने कर्मों का फल भोगने के लिए मृत्यु के उपरांत पुनः पुनः नए शरीर धारण करना पड़ता है। जीवात्मा के कर्मों का भोग जब तक पूरा नहीं हो जाता, तब तक उसे नए शरीर धारण करना ही पड़ता है। कर्मों का फल जब एक ही जन्म में भोग पाना संभव नहीं हो पाता या कर्मों का फल-भोग जब एक जन्म में पूरा नहीं हो पाता तो हुए शेष कर्मों का फल भोगने के लिए जीवात्मा को पुनः जन्म लेना ही पड़ता है और इस प्रकार जन्म-मरण का यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक जीवात्मा को मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो जाती ।
मोक्ष की प्राप्ति का अर्थ ही है जीवात्मा का सभी प्रकार के कर्म-बंधनों से मुक्त हो जाना। जीवात्मा का शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य, अच्छे-बुरे आदि सभी प्रकार के कर्म-संस्कारों के बंधन से मुक्त हो जाना। पुनर्जन्म का सिद्धांत आत्मा की अमरता से फलित होता है। आत्मा नित्य एवं अविनाशी होने के कारण एक शरीर से दूसरे शरीर में शरीर की मृत्यु के पश्चात प्रवेश करती है या यों कहें कि शरीर की मृत्यु के पश्चात पुनः नूतन शरीर धारण करती है। मृत्यु का अर्थ शरीर का अंत है, आत्मा का नहीं। इस प्रकार शरीर की मृत्यु के बाद आत्मा का पुनः दूसरा शरीर धारण करना ही पुनर्जन्म है। जीवात्मा के विषय में गोस्वामी तुलसीदास रामचरितमानस में लिखते हैं – ईश्वर अंस जीव अविनासी । चेतन अमल सहज संख रासी ॥ अर्थात जीव, ईश्वर का अंश है। अतएव वह अविनाशी, चेतन, अमल और स्वभाव से ही सुख की राशि है। जीवात्मा निस्संदेह ईश्वर का अंश है। शरीर में वास कर रही आत्मा ईश्वर का ही अंश है, पर सांसारिक विषयों के प्रति आसक्ति की भावना रखने के फलस्वरूप वह बंधनग्रस्त हो जाती है तथा उसे विभिन्न योनियों में, विभिन्न शरीरों में भटकना पड़ता है, पर जैसे ही आत्मा को यह विदित हो जाता है कि मैं ईश्वर का अंश हूँ अर्थात मैं ईश्वर से अभिन्न हूँ, वैसे ही वह अपने वास्तविक सत्-चित्-आनंदस्वरूप को पहचान लेती है और अपने वास्तविक स्वरूप में ही स्थित हो जाती है। यह मोक्ष की अवस्था है। इस अवस्था को प्राप्त कर लेने पर जीवात्मा को पुनः जन्म धारण करना नहीं पड़ता। वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाती है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि मोक्षप्राप्ति से पूर्व जीवात्मा का पुनर्जन्म होता रहता है। जीवात्मा को अपने अच्छे-बुरे, शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य कर्मों के फलस्वरूप पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, मनुष्य आदि विभिन्न प्रकार की योनियों में विचरण करना पड़ता है। अस्तु पुनर्जन्म का सिद्धांत यह स्पष्ट संदेश देता है कि मनुष्य को सदैव बुरे कर्म, पापकर्म से दूर रहना चाहिए और पुण्यकर्म, शुभकर्म भी आसक्तिरहित होकर करना चाहिए अर्थात पुण्यकर्म, शुभकर्म से मिलने वाले मधुर फल अर्थात सुख के प्रति भी आसक्ति नहीं रखनी चाहिए; क्योंकि आसक्ति शुभ के प्रति हो या अशुभ के प्रति, पाप के प्रति हो या पुण्य के प्रति, दोनों ही स्थिति में आसक्ति जीवात्मा के लिए बंधन ही है और उसके पुनर्जन्म का हेतु है। इसलिए इस बंधन से मुक्त होने के लिए हमें सदा आसक्तिरहित होकर ही हर कर्म करना चाहिए।
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