दो महिला अफसरों ने निभाई छत्तीसगढ़ी परंपरा, मितान बनकर दिया भावनात्मक रिश्तों का संदेश

फ्रेंडशिप डे: रिश्ते अब फ्रेंड रिक्वेस्ट से शुरू होकर चैट बॉक्स में खत्म हो जाते हैं। ऐसे समय में छत्तीसगढ़ की दो महिला अफसरों ने कुछ ऐसा कर दिखाया है जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है- उन्होंने एक ऐसी परंपरा को जीवित रखा जो अब सिर्फ गांवों की यादों में सिमट कर रह गई थी। महाप्रसाद (मितान) के आदान-प्रदान की यह परंपरा न तो खून मांगती है और न ही धर्म। यह बस दिल से जुड़ती है। पूजा कश्यप साहू और पुष्पलता धुर्वे ने आधुनिकता के बीच विलुप्त हो रही इस परंपरा को अपनाकर एक नया संदेश दिया है- रिश्तों को निभाने के लिए सिर्फ भावनाओं की जरूरत होती है। उपसंचालक उद्यानिकी पूजा कश्यप साहू और जिला पंजीयक पुष्पलता धुर्वे, दोनों ही राजपत्रित अधिकारी हैं। दोनों अलग-अलग जातियों से हैं, अलग-अलग पृष्ठभूमि से आती हैं, लेकिन जो चीज उन्हें जोड़ती है वह है एक समान मूल्य, आपसी आत्मीयता और समर्पण। वर्ष 2023 में उन्होंने महाप्रसाद (मितान) के आदान-प्रदान का निर्णय लिया और तब से वे शहरी परिवेश में भी इस पवित्र छत्तीसगढ़ी परंपरा का पालन कर रही हैं।
दिसंबर 2023 में पूजा कश्यप अपने परिवार के साथ पुष्पलता के निवास पर पहुंचीं। परंपरा के अनुसार तुलसी के पत्ते, खीर और गेहूं के आटे से प्रसाद बनाया गया। भगवान को भोग लगाने के बाद दोनों ने एक-दूसरे को महाप्रसाद, नारियल, मिठाई, कपड़े और श्रृंगार का सामान भेंट किया। इसके साथ ही वह महाप्रसाद (मितान) बन गईं। तब से दोनों परिवार इस रिश्ते को पूरी निष्ठा से निभाते आ रहे हैं। वे साथ मिलकर त्यौहार मनाते हैं, एक-दूसरे के घर जाते हैं और हर भावुक पल में एक-दूसरे के साथ होते हैं।
शुरुआत में लोग चौंके, लेकिन अब यह रिश्ता एक मिसाल बन गया है। जब उन्होंने अपने परिवार और जानने वालों को बताया कि वे महाप्रसाद बदलने जा रहे हैं, तो कई लोगों को यह फैसला थोड़ा अजीब और पुराने ज़माने का लगा। लेकिन उनके पतियों रोहित सोनी (पुष्पलता के पति) और राजीव साहू (पूजा के पति) ने पूरा साथ दिया और कहा कि इस रिश्ते को निभाना ज़िंदगी भर की ज़िम्मेदारी है। दोनों जोड़ों ने न सिर्फ़ इसे निभाने का संकल्प लिया, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि आज भी परंपराओं का आधुनिकता के साथ पालन किया जा सकता है – बशर्ते भावनाएँ सच्ची हों।
आज के दौर में ऐसी परंपराओं की ज़रूरत: ‘एक मानव समाज’ संगठन के अध्यक्ष सुबोध देव कहते हैं – ‘जब समाज में जाति और धर्म के नाम पर दीवारें खड़ी हो रही हैं, ऐसे में महाप्रसाद जैसी परंपराएँ हमें याद दिलाती हैं कि असली इंसानियत क्या है। आज भी छत्तीसगढ़ के कुछ गाँवों में हिंदू और मुसलमान दोस्त हैं जो हर त्योहार और सुख-दुख में साथ खड़े होते हैं। यही सामाजिक समरसता की असली तस्वीर है।’
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