ज्ञान विज्ञान का केंद्र बना विश्वविद्यालय

Motivation| प्रेरणा: युवाओं को गढ़ने की टकसाल देव संस्कृति विश्वविद्यालय ने नए युग के स्वागत का बीड़ा उठाया है। पूज्य गुरुदेव की इस दिव्य संकल्पना ने अपने मत्स्यावतार के क्रम में अनेक विभूतियों का योगदान स्वीकार किया, जो स्वयं पूज्यवर की प्रेरणा से प्रेरित हो आगे आए। मानव समाज के लिए यह निश्चित ही बड़े आश्चर्य का विषय रहा है कि भला किसी प्रकार किसी भवन के निर्माण की नींव दशकों पूर्व रखी जा सकती है-ऐसा दुःसाध्य कार्य मात्र युगद्रष्टा *स्तर की सत्ता से ही संभव बन पड़ता है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय आज के समय में इसका जीवंत उदाहरण है, जिस गुरुकुल की नींव महाकालस्वरूप पूज्य गुरुदेव ने दशकों पूर्व रखी और इसके निर्माण का दायित्व अपने शिष्यों के सुपुर्द कर इस अभिनव रचना का संरक्षण स्वयं सदैव से करते चले आए हैं। पूज्य गुरुदेव द्वारा तराशे गए नररत्नों में सम्मिलित सिक्किम राज्य के माननीय राज्यपाल महोदय श्री लक्ष्मण आचार्य जी का हाल ही में देव संस्कृति विश्वविद्यालय शुभ आगमन हुआ।
अपने 2 दिवसीय प्रवास के दौरान उन्होंने गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में दशकों पूर्व संपन्न किए साधना सत्र का अनुभव साझा किया। ऋषियुग्म के प्रतिनिधि श्रद्धेयद्वय का आशीर्वाद लेने पहुँचे माननीय राज्यपाल महोदय ने बताया कि किस प्रकार पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी के निर्देशन में की गई साधना ने उनके जीवन को प्रकाशित किया व जिसके फलस्वरूप आज वे एक प्रतिष्ठित पद पर आसीन हैं। माननीय राज्यपाल महोदय ने सपरिवार देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति महोदय से भी शिष्टाचार भेंट की। तत्पश्चात विश्वविद्यालय परिसर के केंद्र में स्थित प्रज्ञेश्वर महाकाल मंदिर में दर्शन कर पूरे परिसर का भ्रमण किया। इस दौरान उन्हें शांतिकुंज एवं देव संस्कृति विश्वविद्यालय की गतिविधियों से परिचित कराया गया। भ्रमण के दौरान उन्होंने एशिया के प्रथम बाल्टिक संस्कृति एवं अध्ययन केंद्र, दक्षिण एशियाई शांति एवं सुलह संस्थान, स्वावलंबन केंद्र का भी भ्रमण कर समस्त परियोजनाओं की प्रशंसा की। उत्तराखंड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान केंद्र (यूसर्क) देहरादून की निदेशक डॉ० अनिता रावत जी का भी देव संस्कृति विश्वविद्यालय आगमन हुआ। प्रतिकुलपति जी से भेंट के अवसर पर उन्हें विश्वविद्यालय की गतिविधियों से अवगत कराया गया व साथ ही पूज्य गुरुदेव का साहित्य भी भेंट किया। यूरोप में स्थित लाट्विया विश्वविद्यालय से 13 लोगों के एक समूह का देव संस्कृति विश्वविद्यालय आगमन हुआ।
प्रतिकुलपति जी से भेंट कर सभी ने मार्गदर्शन प्राप्त किया। लाट्विया के इस समूह का आगमन विशेषकर भारतीय संस्कृति, योग, यज्ञ एवं वैज्ञानिक अध्यात्मवाद को जानने एवं समझने हेतु हुआ। चेक गणराज्य के 35 लोगों के समूह का आगमन हुआ, जिनका मुख्य उद्देश्य देव संस्कृति विश्वविद्यालय में चार दिनों की विशिष्ट कार्यशाला में प्रतिभाग कर भारतीय संस्कृति, वैज्ञानिक अध्यात्मवाद एवं योग को जानना था। देव संस्कृति विश्वविद्यालय के नैसर्गिक एवं दिव्य वातावरण में युगतीर्थ शांतिकुंज में सन् 1926 से सतत प्रज्वलित दिव्य अखंड दीप शताब्दी समारोह के उपलक्ष्य में सक्रिय कार्यकर्त्ता सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में उत्तराखंड के माननीय राज्यपाल ले०ज० (से०नि०) श्री गुरमीत सिंह जी एवं उत्तराखंड के माननीय वित्तमंत्री जी का आगमन हुआ।
इस विशिष्ट अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय ने सम्मेलन में आए सभी सृजन सेनानियों को संबोधित करते हुए कहा- “मैं एक सैनिक हूँ और मुझे खुशी इस बात की है कि परमपूज्य गुरुदेव ने सभी गायत्री परिजनों को सृजन सैनिक बनाया है। अखण्ड ज्योति की जो दिव्यता-भव्यता और अखंडता है, उस अखंड दीप को मैं प्रणाम करता हूँ। आप सभी से अपील करता हूँ कि ये जो आने वाले 3 साल हैं, इसमें आप अपनी साधनाएँ संकल्प के साथ-साथ पूज्य गुरुदेव के युगनिर्माणी कार्यों में पुरजोर तरीके से जुट जाइए।” माननीय राज्यपाल जी ने आगे कहा- “जब मैं इस परिसर में आता हूँ तो यह अनुभव करता हूँ कि यह कोई साधारण परिसर नहीं, अपितु मंदिर है; क्योंकि यह परिसर जाग्रत है।” साथ ही उन्होंने यह भी कहा – “त्रिशूल के तीन शूल हमें तीन संदेश देते हैं कि यह भारत विकसित भारत, आत्मनिर्भर भारत और विश्वगुरु भारत है।
सम्मेलन में अतिथि के रूप में पधारे उत्तराखंड के माननीय वित्तमंत्री जी ने कहा- “देव संस्कृति विश्वविद्यालय मानवता के लिए कार्य कर रहा है। यहाँ त्याग-तपस्या और लगनशीलता के साथ कार्य कर रहे युगसेनानी देखने को मिलते हैं। मैं यहाँ आकर अपने आप को धन्य समझता हूँ; क्योंकि यह वह स्थान है, जिसे मैं मंदिर के रूप में देखता हूँ। पूज्य गुरुदेव ने जो युग-सुधार का पौधा लगाया था, वह आज वटवृक्ष के रूप में बदल चुका है।” सम्मलेन में विश्वविद्यालय क सा संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, अधिकारीगण समेत आचार्यगण व सभी विद्यार्थी एवं शांतिकुंज सम्मेलन में आए सभी क्षेत्रीय कार्यकर्त्ता उपस्थित रहे। हिंदी दिवस के अवसर पर देव संस्कृति विश्वविद्यालय में दो दिवसीय हिंदी साहित्य सम्मेलन का आयोजन किया गया है। हिंदी साहित्य सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् के माननीय अध्यक्ष डॉ० विनय सहस्त्रबुद्धे जी, उच्च न्यायालय, नैनीताल के माननीय न्यायाधीश श्री विवेक भारती शर्मा जी, वैली ऑफ वर्ड्स शब्दावली के संस्थापक श्री संजीव चौपड़ा जी उपस्थित हुए।
कार्यक्रम का शुभारंभ परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीया माताजी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन कर किया गया। हिंदी साहित्य सम्मेलन में पधारे सभी मुख्य अतिथियों का आदरणीय प्रतिकुलपति महोदय जी ने गायत्री मंत्र-चादर एवं पुष्प-गुच्छ देकर स्वागत किया। सम्मेलन में आए लोगों को संबोधित करते हुए वैली ऑफ वर्ड्स के संस्थापक डॉ० संजीव चौपड़ा जी ने कहा- “जो सम्मान हिंदी भाषा को मिलना चाहिए, वह सम्मान उसे नहीं मिल पा रहा है और हम उसको उसका सम्मान दिलाने के लिए निरंतर कार्यरत हैं।” सम्मेलन में आए श्रोताओं के बीच अपने विचारों को रखते हुए माननीय मुख्य अतिथि डॉ० सहस्त्रबुद्धे जी ने कहा- ” भाषा, संस्कृति की वाहक होती है।
भारत अनेक भाषाओं वाला देश है, जिसकी बड़ी बहन हिंदी है।” उन्होंने आगे कहा- “अगर हिंदी को विश्व में स्थापित करना है, तो सबसे पहले इसे हमें अपने हृदय में स्थापित करना होगा। हिंदी भाषा में हो रही मिलावट को बचाने के लिए आज के युवाओं को आगे आना होगा।” अगली श्रृंखला में कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रतिकुलपति जी ने कहा- “दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश भारत है, भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा हिंदी है और भाषा की श्रेणी में देखा जाए तो हिंदी चौथे स्थान पर है, जिसे पहले स्थान पर ले जाने के प्रयास जारी हैं और हिंदी दिवस के अवसर पर यह हिंदी साहित्य सम्मेलन ऐसा ही एक प्रयास है।” इस अवसर पर विश्वविद्यालय के समस्त संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, आचार्यगण, छात्र- छात्राएँ एवं सम्मेलन में प्रतिभाग कर रहे सभी प्रतिभागी उपस्थित रहे। देव संस्कृति विश्वविद्यालय एवं वैली ऑफ वर्ड्स के संयुक्त तत्त्वावधान में चल रहे दो दिवसीय हिंदी साहित्य सम्मेलन का समापन किया गया।
इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों से आए हिंदी साहित्यकारों एवं कवियों ने हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए चलाए जा रहे अभियानों की जानकारी दी, तो वहीं युवा पीढ़ी को हिंदी भाषा का ज्यादा-से-ज्यादा प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया गया। समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं माननीय सांसद डॉ० रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ जी ने कहा- “समय का सदुपयोग सीखना चाहिए, जिन्होंने भी समय का सही उपयोग किया है, वे मानव से महामानव बन गए हैं। नालंदा एवं तक्षशिला विश्वविद्यालय में ज्ञान-विज्ञान अनुसंधान का कार्य होता था, वह परंपरा आज भी भारत में विद्यमान है और इसे विकसित करने की आवश्यकता है।” उन्होंने आगे कहा- “साहित्य और संस्कृति का अनुपम दृश्य आपके बीच आकर देखने को मिल रहा है।
पूज्य गुरुदेव के चरणों में रहने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ है। ऊर्जा का केंद्र यह विश्वविद्यालय है और इसमें आए सभी प्रतिभागियों का हृदय से स्वागत करता हूँ। देव संस्कृति विश्वविद्यालय मात्र देश की आशाओं का ही केंद्र नहीं, अपितु यह आने वाले समय में विश्व की आशाओं का भी केंद्र बनेगा।” देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति जी ने कहा- “यह समय भारत के जागरण का है, समय करवटें ले रहा है, ऐसे समय में सभी को सावधान होकर अपनी भूमिका को ईमानदारी से पूरा करना चाहिए। भारत को दिशा देने का कार्य हिंदी एवं संस्कृत भाषा में विद्यमान है; संस्कृत भाषा में जितना ज्ञान का भंडार है, उतना किसी और भाषा में नहीं है।” इससे पूर्व वैली ऑफ वर्ड्स के संस्थापक श्री संजय चौपड़ा जी ने हिंदी साहित्य सम्मेलन के विविध कार्यक्रमों के साथ दो दिवसीय सम्मेलन की उपलब्धियों पर चर्चा की। वरिष्ठ साहित्यकार पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी जी ने अपने कई दशकों के साहित्य अनुभवों को साझा करते हुए युवा पीढ़ी को श्रेष्ठ हिंदी साहित्य निमित्त रूप से अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया। इस अवसर पर देव संस्कृति विश्वविद्यालय के सभी विभागाध्यक्ष को प्रशस्ति पत्र एवं स्मृतिचिह्न देकर सम्मानित किया।
प्रख्यात शिक्षाविद्, भारत के द्वितीय राष्ट्रपति, महान दार्शनिक भारतरत्न डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती एवं शिक्षक दिवस के अवसर पर देव संस्कृति विश्वविद्यालय में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया। जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में देव संस्कृति विश्वविद्यालय के आदरणीय कुलपति श्री शरद पारधी जी, प्रतिकुलपति जी एवं आदरणीय कुलसचिव श्री बलदाऊ देवांगन जी उपस्थित हुए। कार्यक्रम का शुभारंभ परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीया माताजी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन कर किया गया। शिक्षक दिवस के कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों को वीडियो संदेश के माध्यम से संबोधित किया।
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