ड्रैगन फ्रूट की खेती और इसके छिलके का उपयोग

ड्रैगन फ्रूट की खेती सूखी और गर्म जलवायु में आसानी से की जा सकती है। यह पौधा कैक्टस प्रजाति का होता है, इसलिए इसे कम पानी की ज़रूरत होती है। जहाँ पारंपरिक खेती असफल हो जाती है, वहाँ ड्रैगन फ्रूट जीवन का प्रतीक बनकर उगता है। किसान बंजर भूमि को उपजाऊ बना रहे हैं — यही इसकी खूबसूरती है।

ड्रैगन फ्रूट का पौधा देखने में कैक्टस जैसा होता है, जिसमें हरे मांसल तने और कांटे होते हैं। इसे मजबूत खंभों या तारों का सहारा देना पड़ता है। गर्मी और धूप में यह तेजी से बढ़ता है। हर पौधे को 20–25 दिन में एक बार पानी देना पर्याप्त होता है। जैविक खाद का उपयोग इसकी गुणवत्ता बढ़ाता है।

पौधे में फूल आने के लगभग 30–40 दिन बाद फल तैयार हो जाते हैं। पकने पर उनका रंग गहरा लाल या पीला हो जाता है। कटाई सावधानी से करनी होती है ताकि पौधा दोबारा फल दे सके। एक बार लगाया गया पौधा 15–20 साल तक फल देता है — यह इसे आर्थिक रूप से बहुत लाभकारी बनाता है।

ड्रैगन फ्रूट का गूदा मीठा, ठंडा और पौष्टिक होता है। इसमें विटामिन C, फाइबर और एंटीऑक्सिडेंट भरपूर मात्रा में होते हैं। इससे जूस, जैम, आइसक्रीम, शेक और सलाद तैयार किए जाते हैं। नियमित सेवन से यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और त्वचा को निखारता है।

अब तक ड्रैगन फ्रूट का छिलका बेकार समझा जाता था, लेकिन यही असली खज़ाना है। इसमें एंथोसाइनिन और पॉलीफेनॉल जैसे तत्व होते हैं जो त्वचा और सेहत के लिए बेहद उपयोगी हैं। इसे फेंकने की बजाय इसका प्रयोग कई नई चीज़ों में किया जा सकता है।

ड्रैगन फ्रूट के छिलके से कई प्रकार के उत्पाद बनाए जा रहे हैं: – प्राकृतिक रंग (Natural Dye): कपड़ों और फूड इंडस्ट्री में उपयोग। – बायोप्लास्टिक: पर्यावरण-हितैषी पैकेजिंग में इस्तेमाल। – कॉस्मेटिक प्रोडक्ट: फेसपैक, साबुन और क्रीम में उपयोग। – चाय और जैम: सूखे छिलके से हर्बल चाय या जैम बनाया जा सकता है। यह खेती से जुड़ी Zero Waste Farming की दिशा में एक बड़ा कदम है।

देश के कई कृषि विश्वविद्यालय और स्टार्टअप ड्रैगन फ्रूट के छिलके पर शोध कर रहे हैं। युवा उद्यमी इससे हर्बल कलर, पैकेजिंग मटेरियल और स्किनकेयर ब्रांड तैयार कर रहे हैं। यह किसानों को अतिरिक्त आय का साधन और युवाओं को नया रोजगार दे रहा है।

ड्रैगन फ्रूट की खेती पर्यावरण के लिए अनुकूल है — कम पानी में अधिक उत्पादन देती है। इसके छिलके का पुन: उपयोग कचरा घटाता है। यह खेती भविष्य की “ग्रीन इकोनॉमी” का हिस्सा बन रही है। किसान, वैज्ञानिक और समाज — सभी मिलकर एक टिकाऊ भविष्य बना रहे हैं।