कोण जाने कब घर आ जाये भगवान

साहेब नाम के एक संत भगवान के बहुत बड़े भक्त थे। वे गुलाल साहेब के खेत में हल चलाते थे। कहते हैं कि एक दिन जब वे खेत में हल चलाने गए तो उनके अंदर भक्ति उमड़ पड़ी। उन्होंने बैलों को खेत में ही छोड़ दिया और मेड़ पर बैठकर भगवान का ध्यान करने लगे। उन्होंने ध्यान में देखा कि भगवान उनके घर आए हैं। भगवान के आगमन पर उनकी पूजा की जा रही थी। संतों के लिए भोज का आयोजन किया गया था। ध्यानमग्न बुल्ला साहेब खुशी-खुशी संतों को प्रसादी परोस रहे थे। इसी बीच गुलाल साहेब खेत में पहुंचे। उन्होंने देखा कि देर हो जाने के बावजूद खेत की जुताई ही नहीं हुई है। उन्होंने ध्यानमग्न बुल्ला साहेब को लात मारकर जगा दिया। जब गुलाल साहेब ने लात मारी तो बुल्ला साहेब ध्यानमग्न संतों को दही परोस रहे थे। इससे बुल्ला साहेब का ध्यान भंग हुआ, लेकिन गुलाल साहेब ने देखा कि बुल्ला साहेब के हाथ से दही गिर रहा है। बुल्ला साहब ने कहा, ‘गुरुजी, मेरी गलती माफ कर दीजिए, लेकिन अगर मैं थोड़ी देर और रुक जाता तो संतों को परोसने के लिए सिर्फ दही ही बचता।’ यह दृश्य देखकर गुलाल साहब उनके चरणों में गिर पड़े और क्षमा मांगते हुए उन्हें अपना गुरु बना लिया। बुल्ला साहब से जुड़ी ऐसी कई कहानियां हैं। उन्होंने अपनी एक साखी में लिखा है- आठ पहर चौसठ घरी जन बुल्ला घर ध्यान। नहीं जानो, कोई मरी आई मिलती भगवान..
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