बुद्धिमानो! मूर्ख क्यों बनते हो?

Motivation| प्रेरणा: मनुष्य की बुद्धिमत्ता प्रसिद्ध है। उसकी चतुरता, क्रियाकुशलता और सोचने की अद्भुत शक्ति की जितनी प्रशंसा की जाए, उतनी ही कम है। सृष्टि का मुकुटमणि होने का गौरव उसने अपनी बुद्धिमत्ता के बल पर प्राप्त किया है और विविध दिशाओं में अनेकानेक आविष्कार करके अपने को साधनसंपन्न बनाया है। इतना होते हुए भी हम देखते हैं कि मनुष्य में मूर्खता की मात्रा कम नहीं है। हम नित्य असंख्यों को मरते हुए देखते हैं, पर अपने आप को अमर जैसा अनुभव करके काम और लोभ के फंदे में फँसे रहते हैं। पाप के दुष्परिणामों से असंख्यों प्राणी दुःख से बिलबिलाते हुए देखे जाते हैं, उन्हें देखते हुए भी हम पाप करते हैं और सोचते हैं कि पाप के फल से मिलने वाले दुःख से बचे रहेंगे।
क्षणिक सुखों के बदले चिरकालीन सुख-शांति को ठुकराते रहने वालों की संख्या कम नहीं है। इन क्रियाकलापों को किस प्रकार बुद्धिमानी कहा जाएगा। सांसारिक मनोरंजन की बातों में बुद्धिमानी दिखाना और आत्मस्वार्थ को भूले रहना यह कहाँ की समझदारी है। पाठको ! मूर्ख मत बनो। मनुष्योचित बुद्धिमत्ता को अपनाओ, खिलौने रँगने के लिए अपना रक्त मत बहाओ, सच्चे स्वार्थ को ढूँढ़ो और परमार्थ की ओर कदम बढ़ाओ ।
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