उपासना

Motivation| प्रेरणा: सर्वव्यापी ईश्वरीय चेतना की उपासना मानवीय जीवन की एक ऐसी अनिवार्यता है, जिसका अनुपालन न करने पर अंतरंग का कलुषित होना, आत्मसत्ता पर कषाय-कल्मषों के आवरण का छा जाना सुनिश्चित हो जाता है। उपासना का शाब्दिक अर्थ-ईश्वरीय चेतना के सामीप्य को प्राप्त करने से लगाया जाता है। ईश्वर के पास बैठने का अर्थ अपनी पात्रता बढ़ाने, दैवी गुणों को धारण करने से लगाया जा सकता है। यही कारण है कि परमपूज्य गुरुदेव ने उपासना को आत्मा का प्रतिदिन का भोजन कहकर के पुकारा है। उपासना में अपनी श्रद्धा को आदर्शों के समुच्चय, श्रेष्ठताओं, सद्गुणों के समुच्चय पर आरोपित करने का क्रम चलता है।
जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, उसका व्यक्तित्व भी कुछ वैसा ही विनिर्मित हो जाता है। इसीलिए भगवान गीता में कहते हैं कि ‘श्रद्धामयोऽयं पुरुषो व्यो यच्छ्रद्धः स एव सः ।’ उपासना के क्रम में परमात्मसत्ता से एकाकार होने के इसी भाव को जाग्रत एवं जीवंत बनाया जाता है। जिस दिन ऐसा संभव हो जाए – उसी दिन हमारे जीवन में परमात्मा का, महानता का, श्रेष्ठता का प्रवेश हो जाता है और व्यक्तित्व आमूलचूल बदलता चल जाता है। भगवान शंकराचार्य ने कहा कि ‘जीवो ब्रह्मैव नापरः’ अर्थात जीव ही ब्रह्म है। नर की नारायण में, पुरुष की पुरुषोत्तम में और क्षु की महान में परिणति ही जीवात्मा की नियति है। उसी संभावना क साकार करने का पथ उपासना का पथ है।
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