गीता में योग साधना

Bhagwat Gita : विश्वविद्यालय परिसर में इस बार के शारदीय नवरात्र के अवसर पर परम श्रद्धेय कुलाधिपति डॉ० प्रणव पण्ड्या जी ने ‘श्रीमद्भगवद्गीता में योग-साधना’ पर अपना उद्बोधन दिया और इस हेतु छठवें अध्याय के 10 वें श्लोक से लेकर 18वें श्लोक में निहित योग-साधना के गूढ़ार्थ तत्त्व विवेचन को समझाया। श्रीमद्भगवद्गीता के इन नौ श्लोकों में निहित योगतत्त्व किस तरह से काव्य के नौ रसों से संबंधित हैं, उसका भी गहन व रसपूर्ण विवेचन इसमें किया गया। नवरात्र के इन नौ दिनों की विचारपूर्ण विवेचना का सार-संक्षेप इस प्रकार है-
(1) प्रथम दिन का विषय-योग-साधना की तैयारी। योग-साधना के द्वारा गुरु, शिष्य को ब्रह्मविद्या की अनुभूति प्रदान करता है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण योगेश्वर हैं, योग के मार्गदर्शक हैं, जगद्गुरु हैं, अर्जुन उनसे ज्ञान प्राप्त करने वाला उनका शिष्य है और भगवद्गीता स्वयं योगशास्त्र है। योग-साधना की तैयारी का संबंध – योग में श्रृंगार रस से है। श्रृंगार रस कैसा होता है ? श्रृंगार रस में होता है-मिलन की उत्कंठा । जब हम अपने प्रियजन से मिलते हैं, तो मिलन की उत्कंठा और मिलन में जो मन में हिलोरें और हलचलें होती हैं, उनकी व्याख्या जब कवि करता है, तब श्रृंगार रस कहलाता है।
योग-साधना में भी कुछ ऐसा ही है, हम जिससे मिलने वाले हैं, वो हमारे परम प्रियतम परमेश्वर हैं, भगवान हैं और अपने चित्त की कालिख के कारण, मलों के कारण, भुलावे के कारण, भटकावे के कारण ये वियोग बड़ा लंबा हो गया है, बड़ा पुराना हो गया है, इस बीच हमने भी बड़ी तकलीफ पाई और शायद उन्हें भी हमारी याद आई होगी। तो योग-साधना के लिए योग-साधना की तैयारी करनी पड़ती है। योग-साधना सब नहीं कर पाते, जो इस मिलन की तैयारी करते हैं, वही इस योग साधना के मार्ग पर आगे बढ़ पाते हैं। यह तैयारी कैसी होनी चाहिए ? इसके बारे में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं –
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ।।
अर्थात मन और इंद्रियोंसहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकांत स्थान में स्थित होकर आत्मा को निरंतर परमात्मा में लगावे और इसके लिए हम एकाकी रहने का अभ्यास करें। जब हम एकाकीपन का अनुभव करते हैं, जब हम एकाकी होने का प्रयास करते हैं, तो हम अंदर की भीड़ भगाते हैं। इस बात को कम लोग समझते हैं कि यथार्थ भीड़, यथार्थ हल्ला-गुल्ला, यथार्थ शोरगुल अंदर हो रहा है, लेकिन एकाकीपन में हम अकेले हो जाते हैं। फिर मन में निर्वात होता है, निष्कंप होता है, जिसमें मन में कोई हलचल नहीं होती। योगी इस एकाकीपन की अनुभूति करता है और साधना का आरंभ यहीं से होता है।
(2) द्वितीय दिन- पवित्र स्थान एवं
आसन। योग-साधना के आसन पर स्थिर होने के लिए साधक में आवश्यक है- वीर रस का भाव । क्योंकि मन की इच्छाएँ, कल्पनाएँ, वासनाएँ, आदि मन को स्थिर नहीं होने देतीं, इसलिए आसन पर स्थिर होने के लिए मन में दृढ़ता के साथ वीरता का भाव जरूरी है, ताकि मन को कोई डिगा न सके योग-साधना के लिए पवित्रस्थान व आसन कैसा हो ? इसके लिए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥
शुद्ध भूमि में, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा; ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके उसमें बैठें। जब भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- शुचौ देशे, तो इसका सरल अर्थ है-शुद्ध भूमि, शुद्ध स्थान। शुद्ध स्थान, इसका मतलब यह भी है- अप्रभावित स्थान। यानी जो जीवन की निम्नतर वासनाएँ हैं, उनसे बिलकुल अप्रभावित स्थान और इस तरह के अप्रभावित स्थान का योग साधना में गहरा परिणाम है।
पवित्र स्थान जैसे- गोशाला, शिवालय, देवमंदिर, गंगा-यमुना आदि पवित्र नदियों का किनारा, विंध्य-हिमालय-सुमेरु, कामदगिरि- गोवर्धन आदि दिव्य पर्वत, योगमठ, सिद्धपीठ, किसी योगी की तपस्थली, वट-पीपल-गूलर- आम-बिल्व आदि पवित्र वृक्ष, इसके अलावा घर में भी कोई-न-कोई ऐसा कोना होना चाहिए, जिसे हम पवित्र कह सकें, जो पूजास्थली के योग्य हो।
ऐसे पवित्रस्थल में ध्यान के लिए हमने जो आसन बिछाया, उसमें पहले क्रम में हमने बिछाया कुश, फिर बिछाया मृगचर्म और इसके बाद हमने बिछाया कपड़ा, ये एक के ऊपर एक बिछाया, फिर हम उस पर स्थिर होकर बैठ गए, ये कुश, मृगछाला और रेशमी वस्त्र क्या हैं? ये विद्युतरोधी हैं, अतः इसके कारण ध्यान में हमें जो विद्युत- ऊर्जा प्राप्त होती है, यह संरक्षित रहती है, भूमि में नहीं उतरती है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ध्यान करने के लिए पवित्रस्थल का चयन हो, यह योग-साधना की, ध्यान-साधना की पहली आवश्यकता है। अगर ऐसा पवित्रस्थल मिल जाए, तो वहाँ पर आसन लगाकर स्वयं को स्थिरतापूर्वक बैठाएँ और जहाँ पर हम बैठें, वह समतल भूमि हो, न तो वह स्थल धरती की समतलता से बहुत नीचे हो और न ही बहुत ऊँचाई पर हो, क्योंकि भूमि से निचली सतहों पर निम्नतर तरंगें प्रवाहित होती हैं और भूमि से ऊँचाई के स्तर में श्रेष्ठतम तरंगें प्रभावित होती हैं, लेकिन इन दोनों ही तरह की तरंगों को सहन करने की क्षमता योग साधना का आरंभ करने वाले साधक में नहीं होती, इसलिए भगवान श्रीकृष्ण पवित्र भूमि की सामान्य समतल सतह पर आसन लगाकर योग-साधना का प्रारंभ करने के लिए कहते हैं।
(3) तृतीय दिन-तन की स्थिरता-मन की एकाग्रता। यह इतना आसान नहीं है, अतः इसके लिए साधक में रौद्र रस का संचार चाहिए, ताकि तन की स्थिरता व मन की एकाग्रता में बाधा डालने वाले तत्त्वों से अबाधित रहे।
अब भगवान श्रीकृष्ण योग-साधना के अगले सूत्र में कहते हैं-
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेंद्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥ उस आसन पर बैठकर चित्त और इंद्रियों की
क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अंतःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करें। भारतीय दर्शन की एक शाखा ‘योग’ ने ऐसे
आसन खोजे हैं, जो मानवीय इंद्रियों को अंतर्मुखी करने में अद्भुत रूप से सहयोगी होते हैं और इस तरह की मुद्राएँ खोजी हैं, जो मानवीय इंद्रियों को अंतर्मुखी करने में सहयोगी होती हैं। बैठने के ऐसे ढंग खोजे हैं, जो मनुष्य शरीर के विशेष केंद्रों पर दबाव डालते हैं और उस दबाव का परिणाम विशेष इंद्रियों को शिथिल करना और उनको नियंत्रित करना होता है।
हमारा चित्त कर्म के भार से लदा हुआ है, संस्कारों के भार से बोझिल है। संस्कारों से बोझिल चित्त, कर्मों से बोझिल चित्त- स्थिर नहीं होता है, अस्थिर रहता है। भगवान इसीलिए कहते हैं कि * पहले जरा तैयारी कर लो। ध्यान की तैयारी उतनी ही नहीं है कि आसन बिछा लिया, अच्छी जगह आप बैठ गए तो ध्यान लग गया।
इतने से ही काम नहीं चलेगा, ध्यान की तैयारी के लिए भगवान कहते हैं कि जब आपने मार्ग चयन किया है तो लक्ष्य भी आपको पता होना चाहिए। आत्मविशुद्धये- ये गंतव्य है, लक्ष्य है। आप आसन पर बैठ करके ध्यान क्यों कर रहे हैं ? ध्यान कर रहे हैं आत्मशुद्धि के लिए। आत्मपरिष्कार ही योग-साधना का उद्देश्य है।
ऋषियों में और राक्षसों में क्या फरक होता है ? तपस्या दोनों ही बड़ी विकट करते हैं। लेकिन एक का उद्देश्य – आत्मशुद्धि व परिष्कार होता है और दूसरे का उद्देश्य-शक्ति, सिद्धि व संसार के भौतिक सुखों को प्राप्त करना होता है। भगवान कहते हैं- विवेक उनके पास है, जो योग साधना शुद्धि के लिए करते हैं।
योगसिद्ध होने का मतलब है कि चित्त इतना निर्मल है, इतना निर्धार है कि बैठते ही ध्यान लग जाए। ध्यान शुद्ध मन की स्वाभाविक क्रिया है। मन शुद्ध होगा तो ध्यान लग जाएगा। मन अशुद्ध होगा तो ध्यान नहीं लगेगा।
(4) चतुर्थ दिवस – मन के वन में स्थिरता। मन का यह वन बड़ा भयानक है। इसमें एकाग्रता स्थिरता दोनों के ही टूटने-बिखरने की उम्मीदें ज्यादा हैं। चित्त की चेतना की नई-नई परतों के इस उभरते क्रम में नवीन व भयानक विघ्न उठ खड़े होते हैं। योगसाधक का तप और भगवान की कृपा तथा सद्गुरु का आशीष ही इस पथ का संबल है।
अतः इस अवस्था में साधक को भयानक रस की अनुभूति होती है और इस अवस्था में भगवान श्रीकृष्ण योग-साधना का यह सूत्र कहते हैं-
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ।।
अर्थात काया, सिर और गले को सीधे, अचल, धारण करके तथा दिशाओं को न देखकर केवल अपनी नासिका के अग्रभाग को देखते हुए स्थिर होकर बैठे।
भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार – ध्यानयोग- साधना के लिए क्रमानुसार विधि इस प्रकार है- एक तो शरीर बिलकुल सीधा हो, वह जमीन से नब्बे डिगरी का कोण बनाए। जब साधक की रीढ़ जमीन से नब्बे डिगरी का कोण बनाती है, तो वह साधक करीब-करीब पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बाहर हो जाता है और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बाहर हो जाना ऊर्ध्वगमन के लिए एक मार्ग बन जाता है।
दूसरी बात, योग-साधना की इस विधि में दृष्टि नासाग्र हो, ऐसा होने पर स्वतः ही पलकें झुक जाएँगी, अगर नासाग्र दृष्टि करनी है, तो पूरी आँख खोले रखने की जरूरत भी न रह जाएगी। यह जो आधी खुली आँख है, उसका बड़ा राज है। भीतर आधी खुली आँख से सपने पैदा करना मुश्किल है और बाहर की दुनिया को यथार्थ मानना मुश्किल है। जैसे कोई अपने मकान की देहलीज पर खड़ा हो गया; न अभी भीतर गया, न अभी
बाहर गया, बीच में ठहर गया । जब दृष्टि नासाग्र होती है, तो आपको एक और अद्भुत अनुभव होगा, इसमें आपको आज्ञाचक्र पर जोर पड़ता हुआ मालूम पड़ेगा। दोनों आँखों के मध्य बिंदु पर आपको जोर पड़ता हुआ मालूम पड़ेगा। यह जोर बड़ा महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि यहीं वह द्वार है, जो खुले तो ऊर्ध्वगमन शुरू होता है।
(5) पंचम दिवस – प्रशांतावस्था में अद्भुत अनुभूतियाँ। इस क्रम के आरंभ के पूर्व मन के वन की भयावहता विलीन हो जाती है। अब तो बस साधक में अद्भुत रस का संचार होने लगता है। अद्भुत रस की इन अनुभूतियों के साथ योगसाधक में प्रशांतावस्था स्थिर होने लगती है।
इस अवस्था में भगवान श्रीकृष्ण योग-साधना
*का अगला सूत्र कहते हैं-
*प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥
जिसका अंतःकरण शांत है, जो भयरहित है और जो ब्रह्मचारिव्रत में स्थित है, ऐसा सावधान ध्यानयोगी मन का संयम करके, मेरे में चित्त लगाता हुआ, मेरे परायण होकर बैठे।
ध्यान के जो अनुभव होते हैं और विशेष तौर पर उनके लिए, जो ईश्वरप्राप्ति के मार्ग पर हैं, जो आत्मजागरण और आत्मकल्याण या आत्मसाक्षात्कार के मार्ग पर हैं, उनमें एकाग्रता और स्थिरता के साथ प्रशांत की गहराई में उतरने पर होने वाले अनुभव कभी-कभी बड़े दुर्गम, बडे भयावह होते हैं। क्यों? महर्षि पतंजलि कहते हैं निरतिशयः चित्तः, ध्यान से चित्त खाली होता है, निर्धार होता है।
चित्त की जो परतें हैं जिनमें संस्कार है, जिनमें कर्मराशि है, कर्मबीज है, वो बड़ी कठिन होती है। इसीलिए भगवान पिछले सूत्र में कहते हैं कि यतचित्तेन्द्रियक्रियः – अर्थात चित्त, इंद्रिय और क्रिया को यत्नपूर्वक संयम करने वाला, यत्नपूर्वक वश में करने वाला। यति का मतलब क्या होता है, जिसको कि मन का वशीकरण मालूम है।
तंत्र में एक प्रक्रिया होती है वशीकरण। वशीकरण में हम क्या करते हैं, दूसरों का वशीकरण करते हैं। यहाँ पतंजलि कहते हैं कि मनवशीकार संज्ञा- अर्थात अपने मन को वश में करने वाला, क्योंकि ऐसा व्यक्ति ही योग साधना के पथ पर अग्रसर हो सकता है। यहाँ पर योग-साधना की तीन शर्तें हैं- (1) योगसाधक का अंतःकरण शांत हो, (2) वह भयरहित हो, और (3) वह ब्रह्मचर्यव्रत में स्थित हो, ऐसा होने पर ही वह मन पर संयम करके योग-साधना कर सकता है।
(6) षष्ठ दिवस – मनोलय की अवस्था। योग-साधना में साधक के ‘मन की लय व लीनता की साधना’ के अगले क्रम में अब साधक का प्रवेश होता है। इस क्रम में प्रवेश के पूर्व देह की स्थिति व जीवन के परिदृश्य के प्रति वैराग्य भी बढ़ता है। यह अवस्था सावधानी की है। सावधानी यह कि देह में आस-पास के परिदृश्य में न तो आसक्ति होने पाए और न इसकी उपेक्षा।
इसके लिए चित्त की मलिनता स्वच्छ करने के साथ देह की मलिनता भी स्वच्छ करनी चाहिए। इसके लिए कतिपय हठयोग की क्रियाएँ हैं। इन क्रियाओं को विचारपूर्वक करने से योगसाधक के मन में वीभत्स रस का संचार होता है। इस अवस्था में भगवान श्रीकृष्ण योग-साधना का अगला सूत्र कहते हैं-
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः । शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ।।
इस प्रकार वश में किए हुए मन वाला योगी अपनी आत्मा को निरंतर परमात्मा में लगाता हुआ मुझमें रहने वाली परमानंद की पराकाष्ठारूप शांति को प्राप्त होता है।
निरंतर परमात्मा में चेतना को लगाता हुआ योगी! यहाँ निरंतर का अर्थ है- एक भी क्षण विस्मरण न हो, हर पल, हर क्षण परमेश्वर का स्मरण बना रहे। जागते ही नहीं, निद्रा में भी भीतर एक अंतर-धारा प्रभु की ओर सतत बहती ही रहे, जरा भी इसमें व्यवधान न हो तो यह निरंतर ध्यान हुआ, निरंतर स्मरण हुआ।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा निरंतर प्रभु के ध्यान में लगा हुआ व्यक्ति ही पराकाष्ठा रूप शांति को प्राप्त होता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि शेष सब जन निराश हो जाएँ कि भगवान के लिए पुकार एक क्षण भी नहीं हो पाती है, तो निरंतर कैसे हो पाएगी ?
इस तरह जो भी निरंतर के इस अर्थ को समझेंगे, प्राथमिक रूप से उन्हें निराशा अनुभव होगी कि फिर हमारे लिए कोई द्वार नहीं, मार्ग नहीं, लेकिन निराश होने का कोई भी कारण नहीं है।
* इससे केवल इतना ही सिद्ध होता है कि हमें स्मरण
* की प्रक्रिया ही ज्ञात नहीं है। क्योंकि हमारे हाथ में एक क्षण से ज्यादा कभी भी होता नहीं। कोई उपाय नहीं कि दो क्षण हमारे हाथ में एक साथ हो जाएँ।
इसलिए अगर एक क्षण में भी प्रभु-स्मरण की प्रक्रिया में प्रवेश हो जाए, तो निरंतर में प्रवेश होने में कोई भी बाधा नहीं है। क्योंकि एक क्षण में जो प्रवेश को जान गया, वह हर क्षण में उस प्रवेश को उपलब्ध हो सकेगा। इसलिए बहुत अड़चन नहीं है। बस, उस एक क्षण में प्रवेश की कुंजी
हमारे पास नहीं है. यही अड़चन है। (7) सप्तम् दिवस – योगमय जीवन ।
योग-साधना की मनोलय अवस्था प्राप्त होने पर योगसाधक में करुण रस का संचार होता है। फिर उसमें अपने-पराए के भेद समाप्त हो जाते हैं। उसमें सभी जीवों के लिए, सभी प्राणियों के लिए करुणा जाग्रत हो जाती है। उसमें सर्वत्र अपनत्व की अनुभूति समा जाती है।
इस अवस्था में भगवान श्रीकृष्ण योग-साधना
का अगला सूत्र कहते हैं- नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ हे अर्जुन, यह योग न तो बहुत खाने वाले
का, न बिलकुल न खाने वाले का, न अति शयन करने के स्वभाव वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है। यहाँ भगवान भोजन और शयन में संतुलन की बात करते हैं। भोजन और शयन- हमारे जीवन को संतुलित और असंतुलित करते हैं।
भोजन और शयन का हमारे जीवनक्रम में हमारी जीवनचर्या से बहुत गहरा संबंध है। हमारी दिनचर्या और हमारी रात्रिचर्या ये बताती है कि हमारी योगचर्या होगी या नहीं होगी, हम योगाभ्यास कर पाएँगे या नहीं कर पाएँगे। इस तरह समत्व-योग का विवेचन करते ■ हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि अति चाहे निद्रा – में हो, चाहे जागरण में, चाहे अति भोजन में हो या भूखे रहने में, समत्व-योग में बाधा है। इसलिए – निद्रा, भोजन व जागरण संतुलित मात्रा में हो और ऐसा होने पर मनुष्य की चेतना ऊर्ध्वगामी – होती है।
हमारी निद्रा का सीधा संबंध हमारे मन से है और भोजन का सीधा संबंध प्राण से है। यह बात बड़ी महत्त्वपूर्ण है। जब मन परेशान होता है, असहज होता है तो नींद नहीं आती और जब हमारा प्राण असंतुलित होता है तो भी व्यक्ति को न तो भूख लगती और न ही ठीक से नींद आती है और इस अवस्था में वह रोगी हो जाता है, लेकिन यदि निद्रा संतुलित हो जाए तो वह योगनिद्रा बन जाती है। योगी वह है, जिसकी निद्रा योगनिद्रा हो जाए और वो सुषुप्ति से तुरीय में प्रवेश करे।
भगवान योग-साधना के इस सूत्र में बताते हैं कि भोजन और शयन को संतुलित करके स्वस्थ शरीर और स्वच्छ मन का निर्माण करो; क्योंकि जिनके पास स्वस्थ शरीर और स्वच्छ मन है, उन्हीं के लिए यह योग साधना है, उन्हीं के जीवन के योगमय होने की संभावना व सुनिश्चितता है।
(8) अष्टम् दिवस – योगारूढ़ अवस्था। इसी को महर्षि अरविंद ने ‘ऑल लाइफ इज़ योग’ कहकर वर्णित किया है। खाना-पीना, सोना-जागना, चलना-फिरना-सभी दशाओं में वह योगयुक्त अथवा योगारूढ़ हो जाता है। फिर उसकी जीवन चेतना में सब ओर प्रसन्नता छा जाती है। उसके दुःखों का हरण हो जाता है और उसे सहज व स्वाभाविक हास्य रस की अनुभूति होती है।
इस अवस्था में भगवान श्रीकृष्ण योग-साधना का अपना अगला सूत्र कहते हैं-
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥
दुःखों का नाश करने वाला यह योग तो यथायोग्य आहार और विहार करने वाले का * तथा कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का * और यथायोग्य शयन करने तथा जागने वाले का * ही सिद्ध होता है। दुःखों का नाश करने वाला
*योग संभव तभी होता है, जब सही जीवनशैली हो, जिसमें उचित आहार और विहार, कर्मों में उचित चेष्टा, उचित शयन, उचित जागरण हो, तभी योग दुःखों को हरण करने वाला संभव होता है।
हर एक की अपनी जीवनशैली होती है। भगवान श्रीकृष्ण ने जीवनशैली को परिभाषित नहीं किया है, लेकिन इसके लिए एक शब्द प्रयुक्त किया है-युक्त। भगवान बुद्ध ने भी अपने अष्टांग मार्ग में एक शब्द का प्रयोग किया है- सम्यक । सम्यक दृष्टि, सम्यक वाचा, सम्यक कर्म। सम्यक यानी कि ठीक-ठीक, जितना ठीक है उतना।
युक्त का अर्थ भी है- सम्यक, उचित, ठीक-ठीक। इसका यह अर्थ भी है- सदा- सर्वदा योग में सम्यक रूप से लीन। यही वह योगारूढ़ अवस्था है, जिसे महर्षि अरविंद, महर्षि रमण एवं परमपूज्य गुरुदेव जैसे महामानवों ने जीवन जिया। इसी अवस्था में होता है- दुःखों का हरण। यह भगवच्चेतना में लय-विलय की अवस्था है।
(9) नवम् दिवस – आत्मस्वरूप में
प्रतिष्ठा। योगारूढ़ अवस्था के पश्चात अब योग- साधना के चरम का अंतिम क्रम आता है- आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठा। इसमें योगसाधक योगसिद्ध हो जाता है। इस सिद्धावस्था में उसकी जीवन- चेतना में समाधि की शांति का निर्झर फूट पड़ता है। इस अवस्था में भगवान श्रीकृष्ण योग-साधना का सूत्र कहते हैं-
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥
अत्यंत वश में किया हुआ चित्त जिस काल में अपने स्वरूप में (परमात्मा में) ही स्थित हो जाता है और संपूर्ण पदार्थों से निस्पृह हो जाता है, उस काल में वह योगी है, ऐसा कहा जाता है।
योगसाधक जब अपने जीवन से अहंकार की सत्ता समाप्त करता है, कामनाओं की सत्ता समाप्त करता है, कलुष की सत्ता समाप्त करता है, विषाद और अवसाद की सत्ता समाप्त करता है और अपने जीवन में सत्य की प्रतिष्ठापना करता है, अहं की प्रतिष्ठापना करता है, अपने जीवन का पुनर्निर्माण और नवनिर्माण करता है, तब उसके जीवन में सब कुछ बदल जाता है। भगवान कहते हैं कि जब ऐसा होता है यानी जब चित्त वश में होता है, जब आत्मा में प्रतिष्ठा होती है, जब मन की सारी कामनाएँ विलीन हो जाती हैं, तब उसे योगी कहा जाता है, तब वो योगसिद्ध कहलाता है।
योग की यह सिद्धावस्था ही योग साधना का चरम व परम है। इसमें न केवल चित्त की कामनाएँ विलीन होती हैं, बल्कि सिद्धियों व विभूतियों का भी लोप हो जाता है। योगसिद्ध की इस अवस्था में साधक, योगसूत्र में वर्णित क्लेश व कर्म की कक्षा भी पार कर लेता है। तभी तो इस अवस्था के लिए कहा गया है- ‘ततः क्लेश कर्म निवृत्तिः’ इस योग साधना का स्वयं के जीवन में यदि अनुभव प्राप्त करना हो तो बस, तीन तत्त्वों की जरूरत है- (1) ईश्वर के लिए व्याकुलता, इसे ही कहते हैं- तीव्र अभीप्सा। दूसरा तत्त्व है-शनैः शनैः भगवान का स्मरण करते हुए उनमें समर्पित होना अर्थात (2) स्मरण व समर्पण। और अंत में तीसरा तत्त्व है, उन्हीं में पूरी तरह से विलीन होना, यही (3) पूर्ण निवेदन है। स्वयं का प्रभु में यही लय व विसर्जन हमें योग-साधना के सभी रहस्यों की अनुभूति कराने में सक्षम है।
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