प्रेरणा

युगावतार

Motivation| प्रेरणा: भारतीय संस्कृति का मूल स्वरूप धर्म और अध्यात्म तत्त्व से अभिपूरित है। ईश्वरविश्वास और आस्तिकता का गुण इसकी जीवनचर्या का अनिवार्य पहलू है। सर्वोच्च सत्ता ईश्वर को सर्वज्ञ मानकर सृष्टिकर्त्ता, नियामक और संचालनकर्त्ता के रूप में स्वीकारने की धारणा एवं मान्यता यहाँ सदैव प्रबल रही है। ईश्वररूपी सर्वोच्च चेतना जब जीवन और सृष्टि में उत्पन्न असंतुलन व असामंजस्य को दूर  करने के लिए हस्तक्षेप करती है तो उसे अवतारी चेतना कहा जाता है। अवतारी चेतना का प्रकटीकरण  तभी होता है, जब जीवन की स्वाभाविक  गतिविधियों में प्रचुरता से विसंगतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं तथा उन्हें हटाया जाना या उनका निराकरण आवश्यक हो जाता है। इसी तथ्य को हमारे धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि जब-जब वसुधा पर धर्म की हानि होती है, तब-तब ईश्वर धर्म की पुनर्स्थापना के लिए  अवतरित होते हैं। ईश्वरीय चेतना के अवतार रूप में प्रकट होने के पीछे दो प्रमुख उद्देश्य अंतर्निहित  रहते हैं। 

      पहला-मौजूद समस्याओं, विसंगतियों,  बुराइयों को दूर करना तथा दूसरा-आने वाली  पीढ़ी के लिए नए मूल्य, नई परंपराओं व  कल्याणकारी प्रेरणाओं का बीजारोपण करना। इन दोनों विशेषताओं से परिपूर्ण व्यक्ति, व्यक्तित्व और विचारों की सुदीर्घ परंपरा हमारी संस्कृति की महान विरासत है। यहाँ प्राचीनकाल से लेकर आज तक अनेक विशिष्ट अवतारों ने जन्म लेकर तत्कालीन युग को कल्याणकारी नेतृत्व प्रदान किया है। यद्यपि विश्व की अनेक आस्तिकतावादी संस्कृतियों में भी अलग-अलग रूपों में अवतारी चेतना के प्रकटीकरण की परिकल्पना मौजूद रही है तथापि भारतीय सनातन संस्कृति में इसकी जड़ें ज्यादा गहरी, प्राचीन, समृद्ध व व्यापक हैं। अवतारवाद से जुड़ी हमारी मूलभूत धारणाओं- आस्थाओं तथा विशिष्टताओं को आधार बनाकर देव संस्कृति विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के अंतर्गत एक महत्त्वपूर्ण शोधकार्य संपन्न किया गया है। सनातन संस्कृति की अवतार-परंपरा में प्रज्ञावतार के रूप में सर्वथा एक नए अवतार की संबद्धता और प्रासंगिकता को तथ्यात्मक रूप से प्रस्तुत करने वाला यह शोध अध्ययन हमारी सांस्कृतिक-धर्मचेतना के युगानुरूप नूतन आयाम को प्रकट करता है। 

             शोध का विषय है-अवतार-परंपरा में प्रज्ञावतार की प्रासंगिकता पर एक विवेचनात्मक अध्ययन। इस विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण शोध अध्ययन को वर्ष-2020 में शोधार्थी चंद्रमणि शुक्ल द्वारा श्रद्धेय कुलाधिपति डॉ० प्रणव पण्ड्या जी के विशेष संरक्षण एवं डॉ० शशिकला साहू के निर्देशन में पूरा किया गया है। सैद्धांतिक एवं विवेचनात्मक विधि पर आधृत इस अध्ययन को शोधार्थी द्वारा कुल पाँच अध्यायों में विभाजित कर प्रस्तुत किया गया है। प्रथम सोपान में विभिन्न धर्मों एवं दार्शनिक विचारधाराओं में प्रस्तुत अवतारसंबंधी मतों की विवेचना की गई है। शाब्दिक व्युत्पत्ति की दृष्टि से अवतार का अर्थ है उच्च स्थान से नीचे स्थान पर उतरना अर्थात जब परमात्मा अपने सच्चिदानंद स्वरूप की स्थिति से उतरकर अपनी ही लीला अथवा माया-क्षेत्र में ऋषियों की भाँति निर्लिप्त जीवनलीला करते हैं तो वे अवतार कहे जाते हैं। देश-काल-परिस्थितियों के अनुसार नाम, रूप, विशेषताओं में भिन्नता हो सकती है, किंतु सभी अवतारों में उसी परमात्मचेतना का प्रकटीकरण होता है। भारतीय संस्कृति में अवतार को परमात्मा • की चेतना का ही पर्याय माना गया है। वेदांत रत्नमंजूषा में उल्लेख है – ‘अवतारो नाम स्वेच्छया धर्म स्थापनार्थमधर्मोपशमनार्थ स्वकीयानाम् इच्छार्थं च विविध विग्रहै आविर्भावं विशेषः ।’ अर्थात परमात्मारूपी सर्वेश्वर जब अपनी इच्छा से धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश करने के लिए तथा भक्त जनों की इच्छापूर्ति हेतु विविध विग्रहों, स्वरूपों में प्रकट होते हैं, तब वे ही अवतार कहलाते हैं। रामायण एवं श्रीमद्भगवद्गीता में भी अवतार के संदर्भ में यही विचार प्राप्त होते हैं। 

               परमपूज्य गुरुदेव के अनुसार जब संसार में असामान्य स्तर की विपन्नताएँ उत्पन्न हो जाती हैं तो उनका समाधान करने के लिए स्रष्टा को स्वयं सक्रिय होना पड़ता है और असाधारण कार्य संपन्न करना पड़ता है। यही अवतार-प्रक्रिया है। अवतार युगधर्म को आधार बनाकर सामयिक समस्याओं का संपूर्ण समाधान करते हैं। अध्ययन का द्वितीय सोपान है – ‘प्रज्ञावतार की पृष्ठभूमि।’ इसके अंतर्गत प्रज्ञावतार का अर्थ एवं अवधारणा, प्रज्ञावतार का स्वरूप, प्रयोजन की विवेचना करते हुए प्रज्ञावतार के संदर्भ में स्वामी रामकृष्ण परमहंस, श्रीअरविंद व महर्षि रमण के योगदान को प्रस्तुत किया गया है। परमपूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य के जीवन दर्शन का सार- प्रज्ञावतार है। प्रज्ञा का तात्पर्य है सद् व असद् में भेद जानने वाली बुद्धि। यह बुद्धि तर्क और विचार से ऊपर प्रखर विवेक और ऋतंभरा प्रज्ञा के रूप में विकसित होती है। प्रज्ञा को साधने, प्राप्त करने गायत्री-साधना का अवलंबन है। का मार्ग साधारण अर्थों में प्रखर विवेक की प्राप्ति के लिए सद्बुद्धि के मार्ग पर चलना ही गायत्री-साधना का मर्म है। पूज्यवर ने इसे युगशक्ति कहा है। 

                   वर्तमान की समस्त समस्याओं के मूल में दुर्बुद्धि व दुर्भावना है, जिसका एकमात्र समाधान युगशक्ति गायत्री का, सद्बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी का आह्वान है। प्रज्ञावतार का केंद्र परमपूज्य गुरुदेव द्वारा संस्थापित युग निर्माण मिशन है, जो विचारक्रांति- अभियान के माध्यम से आत्मपरिष्कार और सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन की सैकड़ों गतिविधियों को विश्वसमाज में निरंतर प्रसारित कर रहा है। मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण-जैसे महान लक्ष्य को जिस अवतारी चेतना की आवश्यकता है, वही चेतना प्रज्ञावतार के रूप में हमारे सम्मुख प्रकट हुई है। देश-विदेश की धरती पर कोने-कोने में फैले गायत्रीसाधक इस अवतारी चेतना के प्रकाश को सद्बुद्धि एवं सद्विचार के रूप में बाँटते हुए प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं। करोड़ों-करोड़ की संख्या में विश्वसमाज में फैले इन गायत्री परिजनों को प्रज्ञावतार के सच्चे उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा सकता है। प्रज्ञावतार के पीछे संलग्न युगशक्ति का प्रकटीकरण इस युग की दुर्लभ घटना और महाक्रांति है। पिछली शताब्दियों में प्रकटे महापुरुषों ने अपनी  दिव्यदृष्टि से इस युग में महाप्रज्ञा के अवतरण की  संभावना को पहले ही प्रकट कर दिया था। रामकृष्ण  के अवतरण की संभावना को पहले ही प्रकट कर  दिया था। रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद,  श्रीअरविंद, महर्षि रमण जैसे अध्यात्मवेत्ताओं ने इस युग के लिए जो कहा है, वह प्रज्ञावतार की प्रक्रिया में शब्दशः साकार दिखाई देता है। ऐसा  प्रतीत होता है कि मानो उन महापुरुषों ने मिलकर ही इसकी पृष्ठभूमि तैयार की हो व विश्वमानवता को प्रज्ञावतार के आगमन का संदेश सुनाया हो। तृतीय सोपान है-‘चेतना के सूत्रसंचालक पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी का व्यक्तित्व एवं कृतित्व ।’ इस सोपान में आचार्य जी का असाधारण जीवनवृत्त एवं उनके व्यक्तित्त्व के बहुआयामी स्वरूप की विस्तृत विवेचना की गई है। 

             इसके साथ ही आचार्य जी द्वारा ऋषि परंपराओं को पुनर्जागरण व भारतीय संस्कृति के नवोन्मेष हेतु क्रियान्वित किए गए प्रकल्पों को प्रस्तुत करते हुए उनके कार्यों में संयुक्त रही माता भगवती देवी शर्मा के जीवन परिचय को प्रस्तुत किया गया है। पूज्य गुरुदेव का जन्म आगरा जनपद, उत्तर प्रदेश के आँवलखेड़ा ग्राम में 20 सितंबर, 1911 में हुआ एवं महाप्रयाण गायत्री जयंती 1990 में। इस  जीवनकाल में उन्होंने सामान्य मानवीय पुरुषार्थ से  कई गुना ज्यादा और व्यापक कार्य किया, जिसकी साधारण बुद्धि से गणना नहीं की जा सकती है। जनसामान्य की जिज्ञासा एवं अध्येताओं के  अवगाहन एवं अनुशीलन की दृष्टि से आचार्य जी के जीवन काल को इस अध्ययन में चार प्रमुख पहलुओं में प्रस्तुत किया गया है। पहला-बाल्यकाल और उससे जुड़ी विशिष्टताएँ, दूसरा-आध्यात्मिक  तपश्चर्या, साधना और ऋषितुल्य व्यक्तित्व का  निर्माण, तीसरा-आचार्य जी द्वारा विश्वव्यापी  युगनिर्माण मिशन का सूत्रपात, लेखन एवं  विचारक्रांति के रूप में युगनेतृत्व में समर्थ तंत्र का विकास एवं संचालन करना है। 

             चतुर्थ पहलू प्रज्ञावतार की युगचेतना को साकार बनाने में समर्थ संस्थानों की स्थापना एवं विराट गायत्री परिवार के रूप में करोड़ों प्रशिक्षित लोगों को समाज में छाई पीड़ा- पतन के निवारण व सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन कार्यों में पूर्णरूपेण नियोजित करना है। संस्कृति पुरुष के रूप में उन्होंने, हमारी संस्कृति की प्राचीन ऋषि परंपराओं का अपने अभियान में पुनर्बीजारोपण किया और आर्ष साहित्य की युगानुरूप व्याख्या कर सनातन सिद्धांतों के प्रकाश में युग निर्माण की नींव तैयार की तथा तपोनिष्ठ बनकर गायत्री तत्त्व की शक्ति से गायत्री परिवार के रूप में विश्वव्यापी विराट संगठन खड़ा कर दिया। उनके ऋषि जीवन के आयाम ही उन्हें प्रज्ञावतार के साकार रूप में अभिव्यक्त करते हैं। अध्ययन का चतुर्थ सोपान है- अवतार-परंपरा के दृष्टिकोण से आचार्यश्री के कार्यों की विवेचना । इसके अंतर्गत आचार्य जी के विचारक्रांति-अभियान के मूलभूत आयाम, कार्य प्रणाली, सप्त आंदोलन तथा आध्यात्मिक साम्यवाद की दिशा में संचालित सुधारात्मक क्रियाकलापों की विस्तृत विवेचना प्रस्तुत की गई है। 

     मानवीय चिंतन और आस्था को निकृष्टता से – उत्कृष्टता की ओर मोड़ देने का नाम विचार क्रांति है। यह आचार्य जी द्वारा प्रवर्तित मनःस्थिति के रूपांतरण से परिस्थितियों में आमूलचूल परिवर्तन उत्पन्न कर चहुँओर सुखद वातावरण उत्पन्न करने  वाली इस युग की एक महान और अद्वितीय क्रांति है। इसका मूल उद्देश्य मनुष्य के मस्तिष्क में छाए कुविचारों, दुश्चितन और दुर्बद्धि के स्थान पर  सद्बुद्धि-स‌द्विचारों का बीजारोपण करना है तथा मानवीय अंतःकरण की दुर्भावनाओं व संकीर्णताओं को दूर कर मानव संवेदना से ओत-प्रोत नए समाज  का नवनिर्माण करना है। इस क्रांति का आधार व्यक्ति निर्माण से प्रारंभ होकर क्रमशः परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्वनिर्माण है और इसकी प्रक्रिया में नैतिक, बौद्धिक, सामाजिक और आध्यात्मिक क्रांति की व्यावहारिक तकनीकें सम्मिलित हैं। ऋषितंत्र का संरक्षण और आद्यशक्ति गायत्री  का संबल तथा आचार्य जी की तपश्चर्या ही विचार क्रांति का प्राण-प्रवाह है। इसकी जीवंतता  व सक्रियता को प्रमाणित करने वाले करोड़ों गायत्री परिजन देश-विदेश में प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं। इस शताब्दी के सर्वाधिक व्यापक और महान अभियानों में यह अग्रणी और अद्वितीय है। विश्वमानवता का कल्याण और सार्वभौमिक उत्थान के महान लक्ष्य को लेकर गतिशील विचार क्रांति के स्वरूप में प्रज्ञावतार के साकार होते आयाम स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं। पाँचवाँ सोपान है- वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रज्ञावतार की प्रासंगिकता। इसके अंतर्गत वर्तमान युग की सभी प्रमुख समस्याओं के समाधान के परिप्रेक्ष्य में प्रज्ञावतार की महत्ता का विवेचन किया गया है तथा इस अवतार के प्रभाव से भविष्य में होने वाले क्रांतिकारी परिवर्तन और विश्वशांति  की स्थापना में प्रज्ञावतार की भूमिका को प्रस्तुत किया गया है। 

                                   अध्ययन में जिन समस्याओं के समाधान का विवेचन किया गया है; वे हैं – आस्था संवर्द्धन, महिला सशक्तीकरण, राजनीतिक स्थिरता, परिवार संस्था का संतुलन, पर्यावरण संतुलन, राष्ट्रीय सुरक्षा एवं शांति के उपाय तथा वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का जीवन दर्शन, आध्यात्मिक साम्यवाद की जीवनपद्धति और आध्यात्मिक मानवतावाद की जीवन-दृष्टि के रूप में प्रकटी प्रज्ञावतार की चेतना सुनिश्चित रूप से विश्वमानवता के उज्ज्वल भविष्य व सार्वभौमिक कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने में सफल रहेगी। अध्ययन का अंतिम सोपान- ‘उपसंहार’ है। इसके अंतर्गत संपूर्ण शोधकार्य का सारांश प्रस्तुत करते हुए निष्कर्ष रूप में शोधविषय के महत्त्व, उद्देश्य एवं प्रासंगिकता का विवेचन किया गया है।

               हमारी संस्कृति में अवतार परंपरा आदिकाल से मौजूद रही है। मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध, महावीर जैसे अवतारों की सुदीर्घ श्रृंखला है, जिनके आदर्शों से मानव समाज सदैव प्रेरित होता आया है। सभी अवतारों के संदर्भ में एक सामान्य लक्षण यह है कि उनके समय की समस्या का जैसा स्वरूप था, उसी के अनुरूप समाधान के उपाय प्रस्तुत किए गए हैं। वर्तमान युग में समस्या का स्वरूप सूक्ष्म है। समस्या का मूल केंद्र विचार और भाव संस्थान की विकृति है, जिसका समाधान मानव मात्र के विचार – परिवर्तन एवं भावशोधन के द्वारा ही संभव हो सकता है। इसी प्रयोजन को सिद्ध और साकार करने हेतु प्रज्ञावतार की आवश्यकता है, जिसे आचार्य श्रीराम शर्मा ने युगधर्म की संज्ञा प्रदान की है। उनका संपूर्ण जीवन दर्शन ही प्रज्ञावतार का पर्याय बनकर प्रकट हुआ है।

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